क्या है कामसूत्र || What is Kama Sutra in Hindi.

अभी कुछ दिन पहले ऑफिस में एक मित्र कह रहा था तुम ऑफिस के बाद घर जाकर क्या करते हो। मैंने कहा आजकल तो भगवद्गीता और पतंजलि योग सूत्र का अध्ययन हो रहा है। वह बोला पर यह उम्र तो 'काम सूत्र' पढ़ने की है, योग सूत्र पढ़ने की नहीं। मैंने उसे कहा, भाई, वो तो मैं आज से पांच छह वर्ष पूर्व ही पढ़ चुका हूँ। फिर मैंने उस भाई को 'सूत्र' शब्द का अर्थ समझाया जो मुझे लगता है हम सभी के लिए उपयोगी होगा।

क्या होता है सूत्र

सूत्र शब्द का वैसे तो मतलब होता है धागा। जिस तरह एक धागे में फूल पिरोकर एक सुन्दर माला बनती है, उसी प्रकार एक सूत्र में शब्दों को पिरोकर एक सुन्दर अर्थ का वाक्य बनता है। प्राचीन काल में ऋषि लोगों द्वारा अधिकतर ज्ञान सूत्रों में लिखा जाता था। इसके पीछे यही रहस्य होता था कि ये सूत्र कम से कम शब्दों में होते थे और इन्हें याद रखना आसान होता था।

वायु पुराण में सूत्र शब्द की सुंदर व्याख्या दी गयी है-

अल्पाक्षरं असंदिग्धं सारवत्‌ विश्वतोमुखम्‌।
अस्तोभं अनवद्यं च सूत्रं सूत्र विदो विदुः॥- वायु पुराण

अर्थात कम अक्षरों वाला, संदेहरहित, सारस्वरूप, निरन्तरता लिये हुए तथा त्रुटिहीन (कथन) को सूत्रविद सूत्र कहते हैं।

अनेक सूत्र ग्रन्थ हैं जो आज भी उपलब्ध हैं। ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, न्यायसूत्र, वैशेषिक सूत्र, पूर्व मीमांसा सूत्र, माहेश्वर सूत्र, वास्तुसूत्र, भगवती सू‍त्र, कात्यायन श्रौतसूत्र..... और यह सूची कितनी ही लम्बी हो सकती है। पर अफ़सोस की बात यह है कि भारतीय हिन्दुओं को इन सब उत्तम सूत्रों के बारे में जानकारी नहीं है। वे जानते हैं तो केवल एक नाम, वह है काम सूत्र। उससे भी बड़ा अफ़सोस यह है कि काम सूत्र के विषय में भी हम सबकी जानकारी सही नहीं है।

क्या है काम सूत्र

भारतीय मनीषियों ने जीवन के चार पुरुषार्थ माने हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हमारे पास धर्म को समझने के लिए अनेक धर्म सूत्र हैं, अर्थ के लिए अर्थ सूत्र हैं जैसे कौटिल्य का अर्थ शास्त्र, काम के लिए काम सूत्र हैं व् मोक्ष हेतु ब्रह्म सूत्र आदि हैं।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि काम सूत्र की रचना किसी भोगवादी, स्त्री अथवा पुरुष आसक्त मनुष्य ने नहीं, वरन एक दार्शनिक, एक ऋषि ने की है जिनका नाम था ऋषि वात्स्यायन।

उनके जन्म के बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, परन्तु उनका काल अति प्राचीन है, यह सर्व मान्य है।

इस ग्रन्थ में मनुष्य का काम व्यवहार कैसा होना चाहिए आदि का विशद रूप से वर्णन है। अब इसमें क्या वर्णन है, उसके लिए आपको स्वयं इन सूत्रों का मूल संस्कृत भाग उसकी व्याख्या सहित लेकर पढ़ना चाहिए। इंटरनेट पर आज किसी जानकारी की कमी नहीं। मैंने तो प्रथम बार २०१२ में मैसूर की एक लाइब्रेरी में मूल संस्कृत सूत्र व् उनकी व्याख्या पढ़ी थी। मेरे विचार से तो यह एक अद्भुत ग्रन्थ है। आज के युवाओं के लिए तो शायद यह अति उपयोगी हो सकता है।

क्यों काम सूत्र बना एक गुप्त विषय

पुरातन भारतीय सभ्यता ने कभी काम को निंदनीय विषय नहीं माना। पुरानी व्यवस्था ही यही थी कि ब्रह्मचर्य आश्रम में रहने के बाद, पच्चीस वर्ष की आयु में कन्या व् कुमार, दोनों के पास यह विकल्प होता था कि या तो वे अगले पच्चीस वर्षों के लिए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करें, अथवा अगर वो पहले ही संसार की क्षण भंगुरता समझ चुके हैं, तो डायरेक्ट संन्यास के मार्ग पर प्रवेश करें।

अगर वे गृहस्थ में प्रवेश करते हैं तो शास्त्र द्वारा विहित भोगों को भोगकर, मर्यादा का पालन करते हुए, पचास वर्ष की आयु में वानप्रस्थ में जाएँ तथा पचहत्तर की आयु में संन्यास लें। मतलब संन्यास हर किसी के लिए आवश्यक था, अब वो पच्चीस की आयु में हो अथव पचहत्तर की, यह चॉइस थी। पर आज कालांतर में, ना तो वह आश्रम व्यवस्था है, ना ही हम अपनी परम्पराओं को महत्व देते हैं। यही कारण है कि जितना अधिक पतन भारतीय समाज का हुआ है, उतना और किसी का नहीं।

मुझे प्रतीत होता है कि बाहर से जब आक्रांता व् लुटेरे इस भूमि पर आये, तभी से हमारे पतन की शुरुआत हुई। उससे पूर्व स्त्री व् पुरुष पूर्ण स्वतंत्रता के साथ धर्म के मार्ग पर, योग के मार्ग पर अथवा गृहस्थ में रहते हुए धर्मपूर्ण काम के मार्ग पर चलते थे।

काम को ना समझने से क्या हानियां हुईं

काम ऊर्जा को ना समझने का ही परिणाम हमें विविध रूप में दीखते हैं। सड़क पर जाती लड़की के साथ छेड़खानी हो अथवा उन्नाव जैसे बलात्कार के केस, ये सभी अगर काम को उसके सही रूप में समझे होते, तो हमारे देश का यह हाल ना होता।

आज जिन चीज़ों को हम अंग्रेजी में 'परवर्शन' कहते हैं, वे सभी काम के विषय में भ्रांतियों के कारण ही हैं।

मंदिरों में कामुक प्रतिमाएं

भारत में आज भी ऐसे अनेक प्राचीन मंदिर हैं जहां काम क्रीड़ाओं में रत देवी देवताओं को दिखाया गया है। आज का मनुष्य तो इन्हें देखकर शर्माने के अलावा कुछ कर ही नहीं पाता। वास्तव में इन्हें बनाने के पीछे उद्देश्य यही था कि अगर तुम सीधे रूप से इन भावनाओं व् विकारों से बाहर नहीं निकल सकते तो चाहे भोग कर ही निकलो। पर कुंठाओं से ग्रस्त नहीं हो।

क्या हो आज का मार्ग

हिन्दू धर्म निश्चित रूप से प्रगतिवादी सोच का है। चूंकि फलाना किताब में ऐसे ही लिखा है, इसलिए ऐसे ही होना चाहिए, ये सोच निश्चित रूप से हिन्दू धर्म की नहीं है। आज भले ही पुरातन व्यवस्था नहीं हो, पर हमारे पास ज्ञान के सभी साधन उपलब्ध हैं। हम अपने विशाल साहित्य को पढ़ें, समझें। "काम जिज्ञासा" से निकलकर "ब्रह्म जिज्ञासा" तक, "योग अनुशासनं" तक जाने की यात्रा आज ही प्रारम्भ करें।

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