क्या है सत्संग

सत्संग

'सत्संग'- यह शब्द सुनते ही हमारे सामने अक्सर वृद्ध, कामकाज विहीन लोगों की छवि उभरती है जो बैठकर किसी संत का उपदेश सुन रहे हों। युवा पीढ़ी को तो अक्सर यह 'बोरिंग' या उबाऊ सा प्रतीत होता है। पर कुछ तो कारण रहा होगा कि सत्संग की आवश्यकता पर भारतीय दर्शन ने बहुत बल दिया है। यह आज प्रमाणित ही है कि जिस भी प्रकार के संग में मनुष्य रहता है, वैसे ही विचार व संस्कार उसके अवचेतन मन में आरोपित हो जाते हैं। वही आगे चलकर कार्य रूप में परिणत भी होते हैं। आज हम अपने जीवन में जो कुछ भी हैं उसमें हमारे पूर्व में किये गए संकल्पों, संग व कर्मों का ही योगदान है। अत: संग का महत्व विचारणीय है।

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क्या है सत्संग

सत्संग क्या है? आसान शब्दों में कहा जाए तो सत्य का संग या ऐसा स्थान जहाँ सत्य की चर्चा हो, वहां जाना ही सत्संग है। 'सत्संग' नाम में ही इसका गूढ़ अर्थ भी निहित है।
स का अर्थ है 'सद्ज्ञान'। ज्ञान व सद्ज्ञान में भी भेद है। ज्ञान इस जीवन से संबंधित है और सद्ज्ञान का संबंध जीवन से परे की वास्तविकता से है। अतः जिस स्थान पर सद्ज्ञान की चर्चा हो, यह सत्संग का प्रथम अंग है। कोई कह सकता है कि हमारे पास तो जीवन के कार्य करने का ही समय नहीं है, ऐसे में हमें भला सद्ज्ञान की क्या आवश्यकता है। परंतु वास्तव में सद्ज्ञान की आवश्यकता किसी गुफा में बैठे योगी से अधिक कर्मक्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति को है। जब कर्म करते हुए जीवन से इतर एक वास्तविकता का बोध रहेगा, तो कर्म करने में अवसाद, प्रमाद व विषाद आ ही नहीं सकता। समूची भगवद्गीता कर्म की इसी कुशलता पर बल देती है। अतः सद्ज्ञान का सीधा सीधा संबंध जीवन प्रबंधन या कहें कर्म प्रबंधन से है।
सत्संग का दूसरा अंग है त् से 'त्याग'। जिस स्थान पर बैठकर अपने किसी भी अवगुण का त्याग किया जाए, वह सत्संग की ही भूमि है। सद्ज्ञान के श्रवण, मनन व निदिध्यासन का फल है त्याग। यही कारण है कि आचार्यों ने श्रवण से भी अधिक बल मनन पर तथा उससे भी अधिक महत्व निदिध्यासन का बताया है। आदि शंकराचार्य तो यहां तक कहते हैं कि "श्रुते शतगुणं विद्यामननं मननादपि निदिध्यासं लक्षगुणम" अर्थात सुने हुए का सौ गुणा मनन व उससे लाख गुणा निदिध्यासन। अगर इसका कुछ अंश भी जीवन में आ जाये तो सद्ज्ञान श्रवण का फल अर्थात जीवन में अवगुणों का त्याग सरल व सहज हो जाता है।
सत्संग का तीसरा अंग है सं से 'संशय नाश'। अनेक प्रकार के संशय मानव मन को आंदोलित करते हैं। कुछ लोग तो कहते हैं कि आज कलियुग में धरती पर संत ही नहीं हैं। इस प्रकार अनेक भ्रमों में फंसा हुआ व्यक्ति स्वयं को अमृत के घूंट से वंचित रखता है। पर सत्संग की भूमि पर बैठकर यह संशय उसी प्रकार छिन्न भिन्न हो जाते हैं जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से बादल। जीवन वही होता है पर फिर भी भीतर कुछ बदल जाता है। यह परिवर्तन ही संशय नाश का लक्षण है।
सत्संग का चौथा अंग है ग से 'गीत'। जिस भूमि पर प्रभु प्रेम के गीत गाये जाएं, भजन की मस्ती हो, यह सत्संग का एक अभिन्न अंग है। संगीत व भारतीय आध्यात्म का संबंध अति प्राचीन है। भगवद्गीता तो स्वयं ही कृष्ण का एक गीत है। आधुनिक विज्ञान द्वारा हुए शोध कार्य भी संगीत के मानव मन मस्तिष्क पर उत्तम प्रभाव को स्वीकार करते हैं। अतः कोई आश्चर्य नहीं कि जब मीरा कृष्ण प्रेम में आनंदित होती है तो गाती है, नर्तन करती है। अतः सात्विक संगीत द्वारा ज्ञान तंतुओं को पुष्ट करना भारतीय परंपरा का अविभाज्य हिस्सा रहा है।

सत्संग के लाभ (सत्संग का प्रभाव):

1. मस्तिष्क का विकास
वर्तमान विज्ञान कहता है कि मानव मस्तिष्क के दो हिस्से दो अलग अलग कार्य करते हैं। मस्तिष्क का बायाँ भाग तर्क, गणित आदि से संबंधित है व दायाँ भाग भावनाओं व संगीत से। सत्संग द्वारा मस्तिष्क के दोनों ही भाग पुष्ट होते हैं। सद्ज्ञान चिंतन व मनन द्वारा बायाँ भाग प्रभावित होता है। नियमित रूप से कुछ समय के लिए जीवन की वास्तविकता पर विचार करना, अपने उद्देश्य का चिंतन करना यह मस्तिष्क के तार्किक हिस्से के लिए आवश्यक है। सत्संग में यह कार्य सहज रूप से हो जाता है। भजन व गीतों द्वारा दायाँ भाग पूर्णतः पुष्ट होता है। अतः एक संतुलित मस्तिष्क के निर्माण में सत्संग की महती भूमिका है।
2. ध्यान की तैयारी
यही ध्यान की भी पूर्व तैयारी है। ध्यान कोई कृत्य नहीं है। वास्तव में 'ध्यान करना' शब्द ही सही नहीं है। आप ध्यान में प्रविष्ट हो सकते हो। उस प्रवेश की पात्रता है चित्त की शुद्धि, मस्तिष्क का संतुलन व सद्ज्ञान की जीवन में समझ। यह तीनों ही पात्रता सत्संग द्वारा सुलभता से प्राप्त होती हैं। कहा भी जाता है "सठ सुधरहिं सतसंगति पाई" अर्थात सत्संग के प्रभाव से दुष्ट भी सुधर जाते हैं। तो आम व्यक्ति तो थोड़े से ही प्रयास से सत्संग का अधिकाधिक लाभ ले सकता है।
कितना हो सत्संग
प्रश्न यह भी उठता है कि जीवन में कितना सत्संग हो। सत्संग मन का आहार है। जैसे शरीर के लिए भोजन की नित्य ही आवश्यकता होती है ऐसे ही मन के लिए भी सत्संग रोज़ होना चाहिए। चाहें दस मिनट ही क्यों ना हो। यही कारण है कि प्राचीन भारत में 'संध्या वंदन' का विधान था। इसमें रोज़ ही कुछ मंत्रों का जप, प्राणायाम, किसी सद्ग्रन्थ का स्वाध्याय आदि सम्मिलित रहते थे। वर्तमान युग में वह परंपराएं तो बदल गयीं हैं पर कुछ परिवर्तन के साथ उनके निहितार्थ को अभी भी जीवित रखा जा सकता है। सत्संग उसी उद्देश्य की पूर्ति करता है। अतः नियमित रूप से कुछ क्षण सद्ज्ञान का अध्ययन या श्रवण करना स्वयं को स्वयं ही एक उपहार देना है। यह अध्ययन आपकी रुचि व धर्मानुसार किसी आध्यात्मिक पुस्तक जैसे भगवद्गीता, मानस, बाइबिल, कुरान या किसी रहस्यदर्शी संत द्वारा लिखी गयी कोई पुस्तक का हो सकता है। पुस्तक से अधिक महत्वपूर्ण आपकी अध्ययन रीति, श्रद्धा व नियमितता है। क्योंकि एक ही सत्य भिन्न भिन्न रूपों में विलग विलग भाषाओं में लिखा हुआ है। आपको क्या रुचिकर लगता है वह आपका निर्णय है। इसी के साथ साथ रोज़ कुछ अच्छा संगीत सुनना भी जीवन में एक नए उत्साह का संचार करता है। इस प्रकार का सत्संग जिसमें सद्ज्ञान की बात, अवगुणों का त्याग, संशयों का नाश व प्रभु प्रेम के गीत हों, जीवन ही बदल देता है। जीवन मात्र संघर्ष ना रहकर 'संग हर्ष' हो जाता है। यही सत्संग की महिमा का कुछ अंश है।
तो रोज़ सत्संग करें और जीवन से डिप्रेशन, तनाव व अवसाद दूर करें।

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