स्वामी रामदेव का सच ।। REALITY OF SWAMI RAMDEV IN HINDI.

स्वामी रामदेव - ये नाम सबसे पहली बार मैंने अपने एक स्कूल मित्र से 2003 में सुना था। वह एक जैन परिवार से था और मुझे बताता था कि एक बाबा टीवी पर आते हैं और उसकी मम्मी उनकी फैन हैं, उन्हें देखकर और सुनकर वो कुछ योग अभ्यास करती हैं।

योग से मेरा कुछ परिचय उस आयु में भी था और थोड़ा थोड़ा उस विषय में theoretically मैंने पढ़ा था। उत्सुकतावश मैंने एक दो बार टीवी पर उन्हें देखा। पर चूंकि मैं टीवी पर देखकर योग सीखने के पक्ष में नहीं था और इस तेरह चौदह वर्ष की आयु में उनके पास जाना संभव नहीं होता था, इसलिए उस समय कुछ अधिक उनके विषय में जानना नहीं हुआ।

पर हाँ, अखबारों में, न्यूज़ में उनके कार्यों के विषय में पढ़ना होता ही रहता था और भारतीय संस्कृति से संबंधित अच्छा कार्य करने के कारण मन में एक सम्मान का भाव रहता ही था।

स्वामी रामदेव को लेकर आपत्तियां

अपनी जॉब के कारण मेरा दक्षिण भारत के त्रिवेंद्रम शहर में रहना हुआ। उस समय कभी कभी सुबह टीवी जब ऑन करता तो रामदेव जी का लाइव योग शिविर आ रहा होता था। एक बार वे सूर्य नमस्कार कर रहे थे, और मूवमेंट्स के साथ साथ उनके लंबे बाल भी इधर उधर हिल रहे थे।

मेरा रूममेट बोला, जब ये बाबा इस तरह एक्सरसाइज करता है, तो मुझे कतई पाखंडी लगता है। मैंने सोचा, पाखंडी!! इसमें इनका क्या पाखंड है?

फिर समय के साथ साथ ऐसे अनेक मित्र मिलते गए, जो कहते थे कि हमें रामदेव की शक्ल ही नहीं पसंद! हे भगवान! रामदेव नाम के इस संन्यासी ने ऐसा क्या किया है जो इतने लोग उन्हें पसंद नहीं करते (वैसे वास्तविकता इसके उलट भी है, ऐसे लाखों करोड़ों लोग हैं जो स्वामी रामदेव के कार्यों के प्रशंसक भी हैं)

पहली आपत्ति

लोगों की सबसे पहली आपत्ति यह होती है कि स्वामी रामदेव बाबा नहीं, बिज़नेसमैन हैं। वे सामान बनाते और बेचते हैं, जो संन्यासी के लिये शोभनीय नहीं है।
इस आपत्ति के पीछे कारण यह है कि हम संन्यास का सही अर्थ ही नहीं समझते। संन्यास के अर्थ जो गीता में भगवान कहते हैं, वह है-
जो कर्म फल के आश्रित हुए बिना कर्म करता है, वह संन्यासी है, वह योगी है, मात्र अग्नि को त्यागने वाला या कर्म ना करने वाला नहीं!

अब स्वामी रामदेव अगर व्यापार का भी कोई कार्य कर रहे हैं, तो इसमें उनका संन्यासी होना कहाँ आड़े आता है? समाज समझता है कि संन्यास का अर्थ है निष्क्रिय होकर एकांत में चले जाना, भिक्षा मांगकर एक दो समय भोजन कर लेना और भगवान का भजन करना! यह परिभाषा तो खुद गीता में भगवान द्वारा बताई गई परिभाषा के विरुद्ध है।

वैसे वास्तविकता यह है कि हमारा समाज विद्वेषात्मक हो चुका है। अधिकांश लोगों की जलन स्वामी रामदेव के बिज़नेस करने से नहीं, उनके बिज़नेस के सफल होने से है। वैसे अगर आप स्वामी रामदेव को व्यापारी भी मानें, तो इसमें बुरा व्यापार क्या है? इससे समाज का कुछ लाभ ही है, हानि तो नहीं!

दूसरी आपत्ति

अनेक लोग कहते हैं कि चलो, बिज़नेस तक तो ठीक है। पर उस बिज़नेस को इतना अधिक बढ़ाना, बड़े बड़े स्टोर्स खोलना, ये गलत है। एक सत्तर वर्ष से अधिक उम्र की महिला कह रहीं थीं कि मैं पंत-जलि (पतंजलि को अधिकांश लीग पंत जलि ही बोल पाते हैं) से ताकत के लिए अश्वगंधा के कैप्सूल लायी थी, वैसे बहुत बड़ी दुकान बना ली है रामदेव ने!! अरे!! आपको जिसकी दुकान से ताकत के कैप्सूल चाहिये, उसकी बड़ी दुकान से आपको क्या समस्या है?

क्षमा करिये, पर यदि यही कैप्सूल सड़क पर टेंट लगाकर कोई आयुर्वेद का विद्वान आपको दे, तो क्या आप खरीदना पसंद करेंगे?

तीसरी आपत्ति

अनेक लोग कहते हैं- ये बाबा रामदेव बोलते बहुत हैं। ये क्यों हर मामले में अपनी राय देते हैं! पर क्या स्वामी रामदेव एक स्वतंत्र देश के नागरिक नहीं हैं? आप अपनी राय चाय पीते हुए अपने मित्रों के सामने देते हैं, वो अपनी राय पूरे देश के सामने दे देते हैं। तो यह तो उनका संवैधानिक अधिकार है। इसमें क्या गलत है?

मेरा कहने का उद्देश्य

ना तो मेरा स्वामी रामदेव से कोई व्यक्तिगत परिचय है, ना ही मैंने उनसे आज तक मुलाकात की है। पर यदि कोई व्यक्ति भारतीय संस्कृति, योग व आयुर्वेद के लिए उत्कृष्ट कार्य कर रहा है तो मैं अवश्य ही उस व्यक्ति के कार्यों का प्रशंसक हूँ।

योग, आयुर्वेद, आध्यात्म - ये भारत की सॉफ्ट पावर्स हैं। विश्व भर में आज इन्हें सम्मान दिया जा रहा है। पर भारत में ही रहने वाले अंग्रेज़ जाने क्यों इस सम्मान से जले जा रहे हैं।

हमने आयुर्वेद का स्वयं कभी सम्मान नहीं किया। आयुर्वेद वेदों से ही आया है, ऋषियों की परंपरा का ये ज्ञान है। आश्चर्य की बात नहीं कि ऋषियों का विरोध करने वाले पुरातन काल में भी थे, अब भी हैं।
आसन प्राणायाम आदि को जन जन तक पहुंचाने का कार्य जिस स्तर पर स्वामी रामदेव ने किया है, वह प्रशंसनीय है।
सबको सन्मति दे भगवान!!
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