फुलसन्दे वाले बाबा से भेंट || Meeting Fulsande Wale Baba in Hindi

'संयम काव्य लहरी' - मेरी कविताओं का संकलन है जिसका विमोचन गत वर्ष ही हुआ था। चूंकि इसमें अध्यात्म, योग, भारतीय संस्कृति के विषय में अनेक कवितायेँ हैं, इसलिए मुझे इस पुस्तक को धर्म व् अध्यात्म के क्षेत्र से सम्बद्ध व्यक्तियों को भेंट करना अच्छा लगता है। इसी शृंखला में कल साध्वी भगवती सरस्वती जी से मुलाक़ात का समय मिला था। वे एक अमेरिकन महिला हैं जो विगत तेईस चौबीस वर्षों से ऋषिकेश के प्रसिद्ध आश्रम परमार्थ निकेतन में निवास कर रही हैं।

फुलसन्दे वाले बाबा से मुलाक़ात

सत्रह अगस्त की सुबह मैं और मम्मी ऋषिकेश जाने के लिए अमरोहा से निकले। मौसम अच्छा था और हल्की हल्की बारिश भी हो रही थी। अमरोहा से ऋषिकेश जाते हुए रास्ते में एक ग्राम पड़ता है 'फुलसन्दा ग्राम' जहां एक आश्रम है जिसमे 'फुलसन्दे वाले बाबा' नाम से प्रसिद्ध एक संत रहते हैं। अब मेरी रूचि रहती है कि कोई संत हैं तो चलें, भेंट करें। मैंने ड्राइवर से गाड़ी रुकवाई और हम अंदर गए। संयोगवश फुलसन्दे वाले बाबा बैठे थे व रूद्र वीणा का सुन्दर वादन कर रहे थे। हम लोग वहाँ बैठ गए।

शायद वह वादन समाप्त होने का ही समय था, दस पंद्रह मिनट बाद उनका वादन पूर्ण हुआ। मैं आगे गया व उन्हें अपना परिचय दिया।

तार्किक प्रश्न

मैंने पूर्व में फुलसन्दे वाले बाबा के कुछ वीडियोज़ व इंटरव्यू देखे हुए थे, इसलिए उनकी विचारधारा या फिलॉसफी से थोड़ा परिचित था। मैंने उनसे कहा कि महाराज, मुझे आपके सभी विचारों पर विश्वास नहीं होता। जो भिन्न भिन्न लोकों में जाने की बात आप करते हैं, क्या वह इमैजिनेशन नहीं?

अब अगर कोई सामान्य व्यक्ति होता तो अपने से इतने छोटे व्यक्ति द्वारा स्वयं के अनुभव पर प्रश्न करने से उद्विग्न हो जाता अथवा कुछ तुरंत प्रतिक्रिया देता। पर फुलसन्दे वाले बाबा नितांत शांत रहे, चेहरे पर कोई लकीरें नहीं। वे बोले, कि आज का विज्ञान अनेक दूसरे ग्रहों में जीवन की खोज कर रहा है। जैसे यह पृथ्वी ग्रह है व इस पर जीवन है इसी प्रकार अनेकानेक लोक हैं जिनमें जीवन है।

मुझे महाराज की बात पूर्णतः तो स्पष्ट नहीं हुई परन्तु उनका मृदु व सौम्य व्यवहार, भाव भंगिमाएं , चेहरे की शान्ति व चित्त का ठहराव स्पष्टतः महसूस हुआ।

'संयम काव्य लहरी' भेंट

फिर मम्मी ने ही मुझे याद दिलाया कि महाराज जी को भी अपनी पुस्तक की एक प्रति भेंट करो। मैंने महाराज को पुस्तक दी, उन्होंने खोला, कुछ पृष्ठों पर निगाह डाली। ऐसा मेरे अनुभव में पहले भी आया है कि हम जिस विषय से सम्बन्ध रखते हैं, सबसे पहले उससे ही जुडी बातों पर हमारी दृष्टि जाती है। फुलसन्दे वाले बाबा वेदों के पूर्ण मर्मज्ञ हैं तथा चारों वेदों के ऊपर बहुत कार्य कर रहे हैं।

बाबा ने कहा कि तुमने अपनी पुस्तक में लिखा है 'मैं वेदों की भूमि भारत का रहवासी हूँ' (यह मेरी पुस्तक की एक कविता है)। हम सभी देवताओं के वंशज हैं और वेदों की भूमि के रहने वाले हैं। फिर उन्होंने अपनी एक पुस्तक 'देवताओं का इतिहास' मुझे भेंट की। पुस्तक वास्तव में बहुत इंट्रस्टिंग है, कुछ पृष्ठ मैंने पढ़े हैं, पूरी पढ़ने के बाद ही बुक रिव्यु लिखूंगा।

मेरे क्रोध पर चर्चा

सभी माएं शायद एक जैसी ही होती हैं। यहां मैं महाराज जी से फिलॉसफी पर चर्चा कर रहा था, कि मम्मी बीच में बोलीं कि संयम को क्रोध बहुत है। और यह गलत भी नहीं था। मुझे एक संत के सामने अपने बारे में ऐसा सुनते हुए पहले तो थोड़ी शर्म आयी, पर तभी महाराज जी ने अति सुंदर व मृदु शब्दों में कहा कि

क्रोध हम सबके ही भीतर होता है। पर उसे प्रकट करना या ना करना हमारे हाथ की बात है।

फिर उन्होंने अपने एक सेवक से अपनी एक पत्रिका मंगवाई। उसके अंतिम पृष्ठ पर क्रोध से सम्बंधित कुछ सूत्र वाक्य लिखे थे (उस पृष्ठ की इमेज नीचे है)। उन्होंने एक एक करके वे सूत्र पढ़े और मुझे समझाए। प्रथम बार मुझे लगा कि वास्तव में क्रोध करने का कोई औचित्य नहीं। मैंने उन्हें बोला कि आज से अपना क्रोध मैं आपको ही दे देता हूँ और दो महीने बाद मैं आपको बताऊंगा कि मैं इसमें कितना सफल हुआ। वे मुस्कुराने लगे।

निष्कर्ष

भारत ऋषियों का देश है। आज भी अनेक महापुरुष ज्ञान, योग, अध्यात्म की अलख घर घर जगा रहे हैं। फुलसन्दे वाले बाबा जैसे संत अपने उदाहरण द्वारा हज़ारों लाखों को व्यसन त्याग, सदाचार के मार्ग पर चलने, जीवन में तपस्या आदि गुणों की प्रेरणा दे रहे हैं। उनके द्वारा यह कार्य और अधिक तीव्र गति से हो, पूरे विश्व का कल्याण हो, इसी कामना सहित- संयम