कौन सा युग है भाई | Ye Kaun Sa Yug Chal Raha Hai in Hindi

अगर आपसे पूछा जाए, ये कौन सा युग चल रहा है। तो आप या कोई भी भारतीय संस्कृति से परिचित व्यक्ति कहेगा, 'कलियुग', 'घोर कलियुग'।
अरे, क्या कहीं कोई ऐसा बोर्ड लगा है? आप कहेंगे हमारे शास्त्र ऐसा कहते हैं, संत ऐसा कहते हैं। आप अगर विभिन्न संत परम्पराओं के महात्माओं को एक स्थान पर बैठाकर एक विचार विमर्श करा दें तो मैं निश्चित कहता हूँ कि कोई सर्व सम्मति नहीं निकलेगी। कोई कहेगा ये कलियुग का अंत है, कोई कहेगा कलियुग तो अभी बालक है, कोई कहेगा ये द्वापर है, आपस में हाथापाई हो जाये, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। तो आखिर ये कौन सा युग है? आम आदमी इसे कैसे समझे?

 

अगर हम इसकी गणितीय बारीकियों पर जाएं, तो समझना बड़ा कठिन हो जाएगा। हमें उसकी आवश्यकता भी नहीं है। बाहर कौन सा युग चल रहा है, ये महत्वपूर्ण नहीं। उससे अधिक ज़रूरी है कि हमारे भीतर कौन सा युग चल रहा है। आप कहेंगे, अरे संयम, तुम्हारी यह बात हम कैसे मान लें? युग हमारे भीतर भला कैसे चल सकते हैं?

 

पर वास्तविकता यही है। चारों ही युग, सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, सब हमारे भीतर ही चलते हैं। तुलसीदास जी महाराज ने रामचरितमानस में इसका बड़ा स्पष्ट वर्णन किया है।

 

"नित जुग धर्म होहिं सब केरे।
हृदयँ राम माया के प्रेरे"
अर्थात राम की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्यों के मन के भीतर सब ही युगों के लक्षण प्रकट होते रहते हैं।

 

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सतयुग क्या है?

"सुद्ध सत्व समता बिग्याना।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना"

सतयुग के चार लक्षण मानस में हैं। सर्वप्रथम 'शुद्ध सत्त्वगुण' अर्थात एक प्रकार का हल्कापन। दूसरा है समता। तीसरा है विज्ञान। विज्ञान माने ज्ञान को उपयोग करने का भी ज्ञान। और चौथा लक्षण है 'प्रसन्न मन'। जिस क्षण ये चारों लक्षण या इनमें से एक भी लक्षण आपके मन में है तो इसे कृतयुग (सतयुग) का ही प्रभाव जानो। तो ऐसा नहीं है कि बाहर से ही कोई युग परिवर्तन होगा तभी हम प्रसन्न होंगे। अगर हम प्रसन्न हैं तो हम सतयुग में ही हैं। बाहर के युगों का महत्व है, पर उससे अधिक महत्व हमारे भीतर चल रहे युगों का है।

त्रेतायुग क्या है

"सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा।
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा"
जिस समय जीवन में बहुत अधिक सत्त्वगुण हो, थोड़ा सा रजोगुण हो, कर्म करने में प्रीति हो और हर प्रकार सुख हो, ये त्रेतायुग के लक्षण हैं। रजोगुण का अर्थ होता है 'हलचल'। हम सभी जानते हैं कि कुछ भी कर्म करने के लिए कुछ तो हलचल की आवश्यकता पड़ती ही है। वही रजोगुण है। तो आप अपने जीवन को देखिए। ऊपर लिखें लक्षण अगर प्रतीत हों तो आप खुद को त्रेतायुग में जानिए।

द्वापरयुग कब होता है

"बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस।
द्वापर धर्म हरष भय मानस"

अभी कौन सा युग चल रहा है

बहुत अधिक रजोगुण (हलचल), बहुत कम मात्रा में सत्त्वगुण, थोड़ा सा तमोगुण और मन में हर्ष व भय हो, यह द्वापर युग का लक्षण है। ध्यान से पढ़िए, जब भी जीवन में सकारात्मकता थोड़ी सी ही रह जाये, बहुत अधिक हलचल में मन हो और थोड़ा सा तमोगुण अर्थात निद्रा आलस्य भी होने लगे, मन में कभी खुशी कभी गम की स्थिति बनी रहे, तो समझ जाइये जनाब। Welcome to Tretayug!!

कलियुग क्या है

"तामस बहुत रजोगुन थोरा।
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा"
तमोगुण बहुत हो, थोड़ा रजोगुण हो चारों ओर वैर विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव हो।
तो जब भी जीवन में:
1. निद्रा आलस्य में ही पड़े रहने का मन करे
2. कुछ भी कार्य करने का मन ना हो (थोड़ा सा रजोगुण)
3. मन में दूसरों के लिए वैरभाव और विरोध हो
तो आप कलियुग में पहुंच चुके हैं।

हम कहाँ रहना चाहते हैं?

बाहर कोई भी युग चल रहा हो, लेकिन हम कौन से युग में रहना चाहते हैं, इसका निर्णय हम स्वयं कर सकते हैं। अंतिम निर्णय देते हुए तुलसीदास जी कहते है:
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं।
तजि अधर्म रति धर्म कराहीं
बुद्धिमान लोग युगों के लक्षणों को मन में ही देखकर, अधर्म छोड़ धर्म में प्रीति करते हैं।

 

क्या सुंदर बात है! अगर आप बुद्धिमान हैं तो अपने मन के ही लक्षणों से युग के लक्षण मिलाइये। स्वयं ही पता चल जाएगा कि आप कौन से युग में हैं। है ना सुंदर बात!

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