संगीत का महत्व – Importance Of Music in Hindi.

कहा गया है 'गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रय संगीत मुच्यते' -
संगीत = गाना + वाद्य + नृत्य

भारतीय चिंतन ने जितना महत्व व सम्मान संगीत को दिया है, उतना शायद ही विश्व में कहीं दिया गया हो। शास्त्रीय संगीत तो अपने मूल को सामवेद में ही पाता है। मीरा भक्ति में मगन होती है तो नाच उठती है, नारद 'नारायण नारायण' गाते हुए विश्व भर में घूमते थे, शादी विवाह में ढोलक की थाप दूर दूर तक गूंजती है- चाहें भक्ति हो या लोकाचार, संगीत भारतीय परम्परा का अविभाज्य हिस्सा रहा है।

कृष्ण बांसुरी बजाते हैं तो शंकर डमरू। शिव का तांडव नृत्य सभी जानते हैं। देवी देवताओं से भी संगीत का गहरा सम्बन्ध है।

क्या कहता है विज्ञान (What the Science says)

हमारे मस्तिष्क के दो हिस्से लेफ्ट ब्रेन व राइट ब्रेन, इन्हें आज का विज्ञान मानता है। बायां हिस्सा तर्क, गणित या कहें लॉजिक से जुड़ा है तथा दायां हिस्सा संगीत, भावनाओं, कल्पना आदि से जुड़ा है। जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए दोनों ही हिस्सों का पर्याप्त मात्रा में विकास आवश्यक है।

कैसे हो बाएं भाग का विकास (How to develop left brain)

बायां भाग अर्थात तार्किक भाग की पुष्टि के लिए रोज़ कुछ ऐसा कार्य करना जिससे दिमाग कुछ सोचने का कार्य करे, यह ज़रूरी है। कुछ पज़ल्स सॉल्व करना, सुडोकु, कोई नयी भाषा सीखना- इनमें से कुछ भी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। रोज़ कुछ ना कुछ नया सीखने से मस्तिष्क तरोताज़ा रहता है।

कैसे हो दाएं भाग का विकास (How to develop right brain)

'गाना आये या ना आये गाना चाहिए'- हम सभी ने ये सुना ही होगा। तो रोज़ थोड़ी थोड़ी देर गुनगुनाना, भले नहाते नहाते ही कुछ गा लीजिये, यह उत्तम होगा। गाना ना चाहें तो कुछ अच्छा संगीत कमरे में चलाकर बैठें व सुनते सुनते उसमें डूबें। संगीत की सुर लहरियों को अपने अंग अंग से स्पर्श करने दें। क्या अनुभव होगा, वह तो अनुभव से ही पता चलेगा।

भारतीय चिंतन की खूबी (Speciality of Indian thought)

संगीत व तर्क द्वारा मनुष्य का विकास कैसे हो, इस पर भारतीय ऋषियों का गहन चिंतन रहा। हमारे यहां सत्संग की परंपरा रही। सत्संग का क्या अर्थ है? जहां सब मिलकर थोड़ी देर बैठें, कुछ ज्ञान चर्चा करें, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा क्या लक्ष्य है, ये विचारें। किसी उत्तम शास्त्र पर विचार करें। यह हुई मस्तिष्क के बाएं भाग की पुष्टि।

उसके बाद मस्त होकर भजन गायें, ताली बजाएं, उन सुर लहरियों में डूब जाएँ । यह हुई मस्तिष्क के बाएं भाग की पुष्टि। यह सत्संग की प्रथा अति मनोवैज्ञानिक रही है।

आजकल विदेशों में इसी को कीर्तन थेरेपी के नाम से मशहूर किया जा रहा है।

वहीं हम भारतीयों को भजन शब्द सुनकर ही इतनी शर्म आती है मानो ये कोई चोरी चकारी की बात है।

  1. पहचानें अपनी विरासत को (Acknowledge your legacy)

हमने ऐसी संस्कृति में, ऐसे धर्म में जन्म लिया है जो कहता है खुल के नाचो, गाओ, आनंद मनाओ। जब तक संसार की इच्छा दिल में हो, खूब भागो। पर फिर शांत बैठकर ध्यानस्थ होना भी सीखो।

यह संस्कृति कोई रूखी सूखी संस्कृति नहीं जहां ईश्वर किसी आसमान में सिंहासन पर बैठकर हम मनुष्यों पर क्रोध करता हो। यह आनंद की, प्रेम की संस्कृति है।

जहां भले ही ईश्वर को लेकर कितने ही मत हों, पर रस व आनंद सभी का हिस्सा है।

तो हम अपनी विरासत को पहचानें, संगीत को अपने जीवन में लाएं व जीवन को आनंदमयी बनाएं।

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