मकर संक्रांति का महत्व || Importance of Makar Sankranti in Hindi.

मकर संक्रांति का पर्व इस बार चौदह जनवरी को मनाया जायेगा। अनेक लोग श्रद्धा से इस पर्व को मनाते हैं, तो वहीं युवा पीढ़ी को इसके विषय में अनेक संशय उत्पन्न होते हैं। क्या है ये पर्व, क्यों इस समय को ख़ास माना जाता है। आइये, इस पर्व से जुड़ी परम्पराओं व रीतियों का महत्व समझते हैं।

संक्रांति का अर्थ

संक्रांति का मतलब होता है 'सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना'। राशि को अगर हम समझना चाहें तो बहुत आसानी से पूरे ब्रह्माण्ड को एक sphere मानकर अगर बारह भागों में divide करें तो तो हर भाग एक राशि कहलाता है। तो मेष (Aries), वृषभ (Taurus), मिथुन (Gemini) से लेकर कुम्भ (Aquarius) व मीन (Pisces) तक, ये बारह राशियां मानी गयी हैं।

अब आप कहेंगे कि सूर्य तो अपनी जगह स्थिर है, फिर वह कैसे एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करेगा? वास्तव में सूर्य तो अपनी जगह ही स्थिर है, पर पृथ्वी के घूमने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्य भी गतिमान है।

ये ठीक ऐसे ही है कि आप ट्रेन में जा रहे हों तो वृक्ष आदि चलते हुए प्रतीत होते हैं। क्या वो वास्तव में चल रहे हैं? नहीं!

ये बहुत ही सरलतम शब्दों में इसकी व्याख्या है। वैसे इसमें अति जटिल गणितीय समीकरण हैं। तो इस प्रकार साल में बारह संक्रांति होती हैं, उनमे से 'मकर संक्रांति' या सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के दिन को भारत में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।

उत्तरायण और दक्षिणायन

साल के छह महीने सूर्य उत्तरायण में तथा छह महीने दक्षिणायन में रहते हैं।

भारतीय काल गणना के अनुसार इस पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं की एक दिन और एक रात होता है जिसे अहोरात्र कहा जाता है।

तो छह महीने देवताओं का दिन और छह महीने देवताओं की रात।

ये बड़ी इंटरस्टिंग बात है। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। एक सामान्य नर मच्छर की औसत आयु दस दिन होती है। और अगर एक मनुष्य नर की औसत आयु पैंसठ वर्ष लें (लगभग साढ़े तेईस हज़ार दिन)। अगर मच्छर हमसे बात कर सकता तो वो क्या सोचता? मेरी उम्र केवल दस दिन है और इस आदमी की साढ़े तेईस हज़ार दिन! क्या वह मच्छर मनुष्य की आयु के बारे में विचार कर सकता है?

यह समय देवताओं की प्रभात या सुबह कहा जाता है। तो अगर आसान शब्दों में कहें तो आज पंद्रह जनवरी से देवताओं का दिन शुरू होता है जो आने वाले छह महीनों तक रहेगा। इसीलिए इस समय को शुभ मानकर सभी सकाम कार्य जैसे शादी, जनेऊ आदि इस समय में किये जाते हैं।

रथ सप्तमी

माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रथ सप्तमी के नाम से मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिन 19 फरवरी को है। इस दिन को सूर्य के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। तो पंद्रह जनवरी से लेकर उन्नीस फरवरी तक- ये एक महीना एक तरह से देवताओं की सुबह का संध्याकाल माना जाता है।

तो जैसे सुबह सुबह यदि एक घंटा अपने को समय दिया जाए, योग, प्राणायाम, उपासना, एक्सरसाइज आदि की जाए तो पूरा दिन अच्छा बीतता है, उसी तरह अगर इस एक महीने में अपनी दिनचर्या को अच्छा रखा जाए तो इसका असर हमारे पूरे वर्ष पर पड़ेगा।

नदियों में नहाने का महत्व

भारतीय ऋषियों ने प्रमुख पर्वों पर नदी में स्नान को बहुत महत्व दिया है। अनेक लोग कहते हैं कि मेंढक, मछलियां भी तो गंगा यमुना आदि में रहती हैं, तो क्या उनका उद्धार हो जाता है? पर क्या एक मेंढक की बुद्धि में और एक मनुष्य की बुद्धि में कोई फर्क नहीं? क्या मेंढक जानता है कि मैं गंगा जी में हूँ?

जब एक मनुष्य श्रद्धा भाव से, भक्ति के साथ, ये मानकर किसी भी नदी में स्नान करता है कि इस स्नान से मेरे पाप ताप नष्ट होंगे, तो ये अवश्य होता है।

सारा खेल मनुष्य की श्रद्धा, उसके विश्वास, उसके भाव का है। अगर बिना भाव के नहाये तो नहाने का उतना परिणाम नहीं होगा जो होना चाहिए।

तो भले ही ज्ञान की एक अवस्था पर पहुँचने के बाद किसी के लिए गंगाजल और साधारण जल में अंतर ना रह जाए, पर भारतीय ऋषियों का ज्ञान बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के लिए है। और वे जानते थे कि संसार का हर मनुष्य तो आध्यात्मिक ज्ञान के लिए प्रयत्न नहीं करेगा, पर उसे भी कुछ ना कुछ आध्यात्मिक लाभ तो हो ही, इस भावना से ये पवित्र नदियों में स्नान के विधान किये गए।

सूर्य उपासना का महत्व

आज भले ही अनेक लोग सूर्य को मात्र हीलियम आदि गैस का एक गोला मानें, पर वे ये तो अवश्य मानेंगे कि सूर्य के कारण ही हमारा जीवन है।

तो सूर्य के प्रति अपना अनुग्रह प्रकट करने के लिए ही सूर्य उपासना का प्रावधान किया गया। सूर्य को प्रत्यक्ष देव कहा गया।

सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे भी वैज्ञानिक कारण भी हैं जिन्हें आज सन गेजिंग (Sun Gazing) आदि कहकर परिभाषित किया जा रहा है। विस्तार तो बहुत हो सकता है, पर सार यही है कि सूर्य उपासना का अत्यधिक महत्व है और मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें ये याद दिलाते हैं।

मकर संक्रांति का पुण्य काल

वैसे तो संक्रांति चौदह जनवरी को पूरा ही दिन रहेगी, पर उसमें भी सुबह 8:20 से लेकर शाम लगभग पौने छह का समय विशेष है जिसे पुण्य काल कहा जाता है। तो इस समय में किया गया दान, आध्यात्मिक साधना, मन्त्र इत्यादि अधिक फल देने वाला माना जाता है।

कुछ अन्य बातें

इस दिन लोग तिल गुड़ आदि का सेवन करते हैं। दान करते हैं, उपासना करते हैं। भारतीय संस्कृति के महिमामय पर्वों में से एक ये मकर संक्रांति भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। अपने आप में अनेक विलक्षणताओं को समेटे हुए विश्व की ये प्राचीनतम संस्कृति अद्भुत है, आश्चर्यचकित कर देने वाली है।

ज्ञानसमाधान के सभी पाठकों को मकर संक्रांति की शुभकामनाएं।

IMG SRC

Copyright © 2019, Gyan Samadhan All Rights Reserved.