साधकों के लिए || For Spiritual Seekers in Hindi.

अध्यात्म की रूचि, स्वयं को जानने की इच्छा, भगवान् के प्रति प्रेम- ये सब या इनमें से कुछ भी, इसकी रूचि इस संसार में विरलों को होती है।

इस जीवन से परे क्या, मैं कौन हूँ, ज्ञान क्या है, भक्ति क्या है, ऐसे प्रश्नों का जीवन में उठना परम सौभाग्य का चिह्न है। सभी ग्रंथों ने, शास्त्रों ने, संतों ने बार बार यही बात कही है।

कौन है संसारी

आहार, निद्रा, भय और मैथुन- ये चार चीज़ें सभी जीवों के लिए एक सी ही हैं। पर मनुष्य के जीवन में एक चीज़ है जो इसे बाकी जीवों से अलग करती है। वह है धर्म!

आम तौर पर पूरी दुनिया में लोग खाते पीते हैं, सोते हैं, अपने से शक्तिशाली व्यक्तियों से भय करते हैं, संतान उत्पन्न करते हैं और एक दिन मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही दुनिया में So Called Normal life कही जाती है। आध्यात्म की भाषा में ऐसे ही लोगों को 'संसारी' या दुनियावी कहा जाता है।

ऐसा जीवन जीते जीते ही मनुष्य का कुछ भला हो सके, इसके लिए ही ऋषियों ने मंदिर जाना, देव दर्शन, तीर्थ, गंगा स्नान, दान, पुण्य- इन सबकी व्यवस्था की। ऋषियों ने कहा तुम अपने घर में रहो, गृहस्थी बनाओ, पर कुछ समय ईश्वर के लिए निकालो। ये सब पुण्य कर्म करते करते मन में आध्यात्मिक खोज पैदा हो सके- इसके पीछे यही कारण था।

साधक की दुविधा

अब संसार में रहने वाले अधिकाँश लोगों की रूचि फैशन, टीवी, सिनेमा, रेस्टोरेंट- इन्हीं चीज़ों में होती हैं। स्वयं की खोज! वो क्या है? उसकी क्या ज़रुरत है! उसका विचार भी majority को आता ही नहीं है!

ऐसे में वो लोग जिनका थोड़ा भी आध्यात्मिक रुझान है, वे स्वयं को दुविधा में पाते हैं। आम मित्रों के पास जाएँ तो वे कहेंगे क्या यार! ये क्या बाबाजी लोगों के चक्कर में पड़ा है! सब बाबा fraud होते हैं। और उनके तर्क पूरी तरह गलत भी नहीं होते।

ऐसा साधक जब सत्संग में जाता है, शास्त्रों का अध्ययन करता है, ध्यान का थोड़ा भी रस लेता है- तो लगता है कि दुनिया में तो लोगों का जीवन पशु जैसा है!

क्या करे साधक

संसार में सबके बीच रहते हुए भी अपने आध्यात्मिक पथ पर चलना ही वीरता है। अगर संसार छोड़कर किसी गुफा में साधना करने भी चले जाया जाए, तो भी चौबीस घंटे तो साधना नहीं होगी! इसलिए अपने मन को दूसरों के विचारों का रंग ना लगे, ये ध्यान देना होगा!

आध्यात्मिक संस्कार, ध्यान, ज्ञान, योग, सत्संग- ये सब रत्नों से भी अधिक मूलयवान हैं। दुनिया की सब चीज़ें खरीदी जा सकती हैं। पर भक्ति, श्रद्धा व ज्ञान- ये किसी बाजार में नहीं मिलते!

इसलिए साधक अपनी श्रद्धा की संभाल अवश्य करे!

संग का प्रभाव

सत्संग की महिमा बार बार संतों ने कही है। हमारा जैसा संग होगा, ऐसे ही हमारे विचार होंगे। इसलिए अपने संग पर ध्यान देने की आवश्यकता है। साधक भले ही सब प्रकार के लोगों के संपर्क में आएगा, आना ही पड़ेगा, पर उनके संग में अपनी साधना के संस्कार ना धुल जाएँ!

इसलिए रोज़ रोज़ सदग्रन्थों का अध्ययन- भगवद्गीता, रामायण, योगवशिष्ठ, अष्टावक्र गीता- कितनी ही सत्शास्त्र हैं! इनका अध्ययन या स्वाध्याय नियमित रूप से करना ज़रूरी है!

दिन में एक समय बैठकर अपने मन की सफाई- यही ध्यान है! ऐसे ध्यान का स्नान बाहर के गंगा स्नान से भी अधिक पुण्यदायी है- ये अमिट शास्त्र वाक्य है!

दूसरों पर ध्यान ना दें

एक दूसरी गलती जो साधक करता है वह है दूसरों को सुधारने की कोशिश। जब वह देखता है कि उसके आस पास तो लोग बुराई, भलाई, निंदा, चुगली, समय बर्बाद करने में लगे हैं, तो वह उन्हें lecture देना शुरू करता है! किसी के शब्दों से आज तक कोई सुधरा हो- ऐसा नहीं हुआ!

कितने महापुरुष इस संसार में आये और चले गए। पर क्या उनकी बात संसार ने मानी?

कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया, बुद्ध ने ध्यान सिखाया, नानक ने गुरबाणी गायी, जीसस ने प्रार्थना सिखाई, मुहम्मद साहब ने विश्वास का सन्देश दिया- इन सभी महापुरुषों के, अवतारों के नाम पर धर्म बन गए, मज़हब बन गए, पर उन महापुरुषों के निजी अनुभव को जानने की रूचि कितने लोगों में पैदा हुई?

इसलिए साधक के लिए सर्वोत्तम है अपना समय waste ना करना। हर क्षण कीमती है। श्वासें कम होती जा रही हैं! इस जन्म में भी यदि अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं किया तो आखिर कब?

शांति कुञ्ज के संस्थापक पंडित श्री राम शर्मा आचार्य एक बहुत सुन्दर बात कहा करते थे- साधक को चाहिए कि दुनिया के लोग क्या करते हैं, क्या बोलते हैं, क्या खाते हैं, कहाँ घुमते हैं - इसकी चिंता छोड़े! केवल और केवल अपने लक्ष्य पर, अपने पुरुषार्थ पर दृष्टि रखे!

संकल्प का प्रयोग

आध्यात्म मार्ग पर चले और उसका पतन हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता!

मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता- ये गीता में भगवान् का वायदा है। इसलिए इस रास्ते पर चलते चलते चाहें कितनी बार ही गिरो, पर उठो! चलना बंद ना हो!

कितना ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार का संस्कार हो, उनसे हार हो, पर प्रयास को ना छोड़ना- ये वीरता है! इसलिए अपने शुभ संकल्प को बनाये रखना, उसे पुष्ट करना, ज्ञान द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान करना- यही मनुष्य जीवन का परम पुरुषार्थ है!

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