दुनिया की सबसे खूबसूरत कृति – माँ

 मैं न तो पूजा ,न अरदास करती हूं ,मां बस तुझसे एक फरियाद करती हूं, औरों को तू चाहे कुछ भी देदे , मैं तो तेरे होठों पर मुस्कान की राह तकती हूं।”
मातृत्व का अर्थ है संतानवती होने की अवस्था। हमारी मां ने हमको जन्म दिया ,यह सहज उनका मातृत्व बंधन है और हमने अपनी संतान को जन्म दिया, यह हमारा मातृत्व बंधन है।

दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द, पता है क्या है... सृजन। और इस खूबसूरत शब्द को खूबसूरत आकार देती है, दुनिया की सबसे खूबसूरत कृति, जिसे हम मां कहते हैं। मां ही है, जो इस दुनिया में बच्चे को जन्म देकर एक नए जीवन का सृजन करती है, और खुद भी उसके पालन पोषण करने के लिए नए रूप में सृजित होती है।तब ही तो ईश्वर ने इस महान कार्य के लिए सिर्फ औरत को चुना है, जो सृजन के बाद , बच्चे को जन्म देने के बाद उस ईश्वर का ही रूप होती है,बच्चे की  जन्मदाता बनकर।

 कभी कभी हम सोचते हैं कितनी अजीब बात है न, ईश्वर की बनाई यह व्यवस्था जरा भी नहीं बिगड़ती। बच्चे को खाना खिलाने,उसको पालने-पोसने या उसकी और सभी तमाम जिम्मेदारियों को बच्चे की जरूरत और परिस्थितियों के मुताबिक चाहे कोई भी निभा ले, पर नन्हें कदमों की धरती पर आहट तो, मां के पेट से ही होती है, उसके अंश के रूप में। क्योंकि ईश्वर चाहते हैं, कि धरती पर आने वाली हर दिव्य आत्मा एक स्त्री के अंदर पले, स्त्री के माध्यम से शुरुआती पोषण प्राप्त करे, और स्त्री से होकर ही वह  संसार में प्रवेश करे। हर कण, स्त्री का अंश हो...।

विज्ञान और तकनीक के युग में कितने ही आविष्कार कर लिए गए, कई एकाधिकार के क्षेत्र की चीजों, विषयों और परिस्थ‍ितियों के विकल्प तलाश लिए गए, कित्नु शिशु को जन्म देने का अधिकार और सौभाग्य आज भी सिर्फ स्त्री के पास है। जब किसी परिस्थिति विशेष में स्त्री सृजन न भी कर पाए, तो अब सरोगेसी के रूप में वह अधिकार प्राप्त है और यह व्यवस्था एक साथ दो स्त्र‍ियों को मातृत्व का सुख और सौभाग्य देती है। यानि विज्ञान भी ईश्वर की इस इच्छा को पार नहीं कर पाया।

"मातृत्व" को शब्दों में बांध पाना असंभव है क्योंकि मां तो ममता का वो सागर है जिसमें दुलार की भावनाएं हरपल हिलोरे लेती रहती हैं ।इसलिए तो कहा गया है कि अगर पूजा करनी है , ईश्वर को प्राप्त करना है तो मां की सेवा करनी है , मां को भगवान का दर्जा देना है।किसी ने मां को नमन करते हुए, उसके प्यार की गहराइयों को आंकते हुए ठीक ही लिखा है..... "

अरे, देखो ,मेरे कलम की स्याही खत्म हो गयी “माँ” लिखते-लिखते, पर अन्त में समझ में समझ आया कि उसके प्यार की दास्तान बहुत लंबी थी।

मां के घर से आने के बाद, मां के न रहने पर, न जाने क्यों आज अपना ही वही घर मुझे अनजान सा लगता है। सोचती हूं कहूँ तो किससे कहूँ कि मां के जाने के बाद यह वही घर - घर सा नहीं लगता।

समूची धरती पर बस यही एक रिश्ता है जिसमें कोई छल कपट नहीं होता। कोई स्वार्थ, कोई प्रदूषण नहीं होता। क्योंकि केवल इस मां के रिश्ते में निहित है अनंत गहराई लिए छलछलाता ममता का सागर। शीतल, मीठी और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। इस रिश्‍ते की गुदगुदाती गोद में ऐसी अनुभूति छुपी है मानों नर्म-नाजुक हरी ठंडी दूब की भावभीनी बगिया में सोए हों।

मां - जैसे इस एक शब्द को सुनने के लिए नारी अपने समस्त अस्तित्व को दांव पर लगाने को तैयार हो जाती है। नारी अपनी संतान को एक बार जन्म देती है। लेकिन मातृत्व के इस सुख को भोगने के लिए गर्भ की कच्ची आहट से लेकर उसके जन्म लेने तक वह कितने ही रूपों में जन्म लेती है। यानी एक शिशु के जन्म के साथ ही स्त्री के अनेक खूबसूरत रूपों का भी जन्म होता है।मातृत्व के इस रूप को प्राप्त करने के लिए कितनी तपस्या करनी पड़ती है।और अन्त में समापन करते हुए.....
किताबों के पन्नों से निकल कर यह तितलियाँ ग़ज़लें सुनाती हैं, पर समझो और अहसास करो कि जब टिफ़िन रखती है मेरी माँ, तो बस्ता मुस्कुराता रहता है।

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